बात कुछ यूं है, की सितम्बर २००२ की एक सुबह हम अर्थात स्वयंभू ममतेय तथा मित्र जय सिंह, इमरान अंसारी एवं दिशाली दी झाँसी रेलवे स्टेशन से सुबह सुबह कर्नाटका एक्सप्रेस से कॉलेज के लिए निकले अपने अपने पिताश्री के साथ। इसके पहले कथा प्रसंग १.१ में वर्णन है यहाँ तक की कहानी का। सन्दर्भ ये था की हम तीनो बालकों के पिताजी लोगों ने निर्णय ले लिए था की हम रूममेट होंगे, ऐसा ही होता था पहले : वैसे आज भी कुछ कुछ वही हालत हैं।
कॉलेज से सभी फॉर्मलिटीज का निर्वाहन कर और हमें एक ही रूम में व्यवस्थित करवा कर,हमारे रूम तक लाया गया और रूम में कैसे रहना है, कहाँ क्या रखना है इत्यादि का ज्ञान दिया जा रहा था। बताते चलें की हम तीनो में सबसे सीधे सरल व्यक्ति थे इमरान भाई एंड एवं सबसे लल्लू थे हम , कम से कम उस समय। हाँ तो इन सब क्रियाकलापों में शाम सी हो गयी और कॉलेज की छुट्टी हो गयी। जाहिर सी बात है की सभी सीनियर्स अपनी थ्योरी क्लास कम्पलीट कर चुके थे दिन की और अब प्रायोगिक कक्षा की बारी थी जिसके GuineaPig होते हैं जूनियर्स।
कुछ सीनियर्स हमारे कमरे #419 में आये और दरवाजा खोलते हुए आवाज़ लगायी बाहर निकलने के लिए, कुछ सम्बोधनों के साथ जिनकी हमे आदत नहीं थी। परन्तु जैसे ही दरवाज़ा पूरा खुला उन्होंने देखा की कमरे में आत्मिक संबल अभी भी मौजूद थे। बस फिर क्या था, तुरंत अभिवादन किया गया हमारे पालकों का और उन्हें दिलासा दिलाई गयी की अब उनके सु-कु-पुत्र सही हाथों में थे और चिंता की कोई बात नहीं थी। इतना सब हुआ ही था कि बाहर कॉरिडोर में लगभग सभी साथी आकर खड़े हो गए थे और उनका श्रवण-सत्कार चल रहा था।
मेरी तो जैसे सिट्टी-पिट्टी गम हो चुकी थी चूँकि साथ में त्वचीयात्मक बल संपर्क की आवाज़ें भी आ रही थी और मेरे पिताश्री तो ये कह कर लाये थे की रैगिंग में तुमसे गाना गवाएँगे बहुत हुआ तो नृत्य करवाएंगे। मैं समझ तो रहा था की अब तो चिड़ियाघर में फँस चुके हैं परन्तु हिंसा में विश्वास तब भी नहीं था। हमारे पिताजी ने हमारे चेहरे के सहज बोथ को पढ़ते हुए उन सीनियर्स (नाम नहीं लिख रहे हैं , खास तौर से Ashish Pandita सर का ) से कहा की अभी हम लोग हैं यहाँ थोड़ा कमरा सेट करवा रहे हैं।
अब भाई पिताजी लोगों के लिए न ऐसा लम्हे १-२ बार ही आते हैं जीवन में , परन्तु सितम्बर के महीने में 2nd ईयर के सीनियर्स को सभी संभाभिक बहानो का अनुभव एवं उसकी काट की जानकारी रहती है। तुरंत ही सीनियर्स ने पिताश्री को समझाया की, अत्यंत आवश्यक कर्मकांडों के लिए बाहर जाना ही पड़ता है। और कुछ अनुभव से पिताश्री ने सोचकर समझाया की अब शादी तो हो ही गयी है, रहना यहीं है तो क्यों दूल्हे की बुआ से बुराई ली जाए।
ऐसा ही हुआ और हमें कक्ष के बाहर खड़ा कर दिया गया ,जहाँ ऐसे ऐसे शब्द सुनने को मिले की कर्ण-विद्य हो गए एवं रक्त सा आना प्रतीत होने लगा। बिलकुल ऐसा दृश्य था जैसा Green Beret training boot camp का होता है, सभी इंस्ट्रक्टर्स एक साथ चिल्ला रहे होते हैं कानों में, साथ में नियम बताये जा रहे होते हैं , एक दो यहाँ वहां से पड़ रहे होते हैं। डेडलाइन दी गयीं टेक्निकल असाइनमेंट्स को कंठस्थ करने की, ग्रूमिंग की , इत्यादि आदि।
अब समापन की और बढ़ चली थी कहानी, ५-७ मिनिट हो गए थे बाहर आये हुए किसी को कुछ कुछ प्रसाद भी मिल चूका था। परन्तु लाइन से प्रसाद अब मिलना चालू हुआ था कनपुरिया में जिसे कंटाप एवं बुंदेलखंडी में लप्पड़ कहते हैं वो मिलने लगे थे और जितने लोग पूजा में आये थे सबने अपनी थाली का प्रसाद हमें स्वयं दिया कोई आलस्य नहीं दिखाया जब तक उनके हाथ दर्द नहीं होने लगे.. फिर हम सबको अगली पूजा का नियत समय जोकि उसी रात्रि का था बताकर जाने को कहा गया।

इस तरह लाल गर्मागर्म गाल लेकर हम कमरे में आये और अपने पिता को देखा जो की अपराधबोधित नज़रों से हमें देख रहे थे और सोच रहे थे क्या इसीलिए इन्हे इंजीनियर बनाने का सपना पाला था। अत्यंत मजेदार द्रष्य रहा होगा। 😀

To be continued..

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